डा अम्बेडकर के लेखन में परस्पर विरोध

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डा अम्बेडकर ने शंकराचार्य की आलोचना करते हुए उनके लेखन में परस्पर विरोधी कथन माने है | उन्होंने उन परस्पर विरोधो के आधार पर शंकराचार्य के कथनों को अप्रमाणिक कहकर अमान्य घोषित किया है और यह कटु टिप्पणी की कि जिसके लेखन में परस्पर विरोधी कथन पाए जाए उसे पागल ही कहा जाएगा |(अम्बेडकर वा. खंड ८,पृष्ठ २८९ )
अब देखिये अम्बेडकर जी के लिखे लेखो में कितना परस्पर विरोध है –
(*१) क्या मह्रिषी मनु जन्मजा जाति के जनक थे ?
इस सम्बन्ध में अम्बेडकर के तीन प्रकार के परस्पर विरोधी कथन है –
(अ) मनु ने जाति का विधान नही बनाया अत: वह जाति का जनक नही –
(क) ” एक बात मै आप लोगो को बताना चाहता हु कि मनु ने जाति के विधान का निर्माण नही किया न वह ऐसा कर सकता था| जातिप्रथा मनु से पूर्व विद्यमान थी| वह तो उसका पौषक था “(अम्बेडकर वा. खंड १ पृष्ठ २९)
(ख) ” कदाचित मनु जाति के निर्माण के लिए जिम्मेदार न हो, परन्तु मनु ने वर्ण की पवित्रता का उपदेश दिया था|……वर्ण व्यवस्था जाति की जननी है और इस अर्थ में मनु जातिव्यवस्था का जनक न भी हो परन्तु उसके पूर्वज होने का उस पर निशिचित ही आरोप लगाया जा सकता है| ” (वही खंड ६,पृष्ठ ४३)
(आ) जाति- संरचना ब्राह्मणों ने की –
(क) ‘ तर्क में यह सिद्धांत है कि ब्राह्मणों ने जाति संरचना की| ‘ (वही खंड १,पृष्ठ२९)
(ख) ” वर्ण निर्धारण करने का अधिकार गुरु से छीन कर उसे पिता को सौंपकर ब्राह्मणवाद ने वर्ण को जाति में बदल दिया|”(वही,खंड१,पृष्ठ १७२)
(इ)मनु जाति का जनक है –
(क) “मनु ने जाति का सिद्धांत निर्धारित किया है |”(वही,खंड ६,पृष्ठ ५७)
(ख) “वर्ण को जाति में बदलते समय मनु ने अपने उद्देश की कही व्याख्या नही की|”(वही,खंड ७,पृष्ठ१६८ )
(*२) चातुर्वर्ण्य व्यवस्था प्र्श्नसीय या निंदनीय –
(अ) चातुर वर्णव्यवस्था प्रशंसनीय –
(क) ” प्राचीन वर्णव्यवस्था में दो अच्छाई थी, जिन्हें ब्राह्मणवाद ने स्वार्थ में अंधे होकर निकाल दिया| पहली ,वर्णों की आपस में एक दुसरे से पृथक स्थिति नही थी| एक वर्ण दुसरे वर्ण में विवाह ,सह भोजन दो बातें ऐसी थी जो एक दुसरे को साथ जोड़े रखती थी | विभिन्न वर्णों में असामाजिक भावना पैदा करने की कोई गुंजाइश नही थी ,(अम्बेडकर वा. खंड ७ ,पृष्ठ २१८ )
(ख) ” यह कहना कि आर्यों में वर्ण के प्रति पूर्वाग्रह था जिसके कारण इनकी पृथक सामजिक स्थिति बनी, कोरी बकवास होगी, अगर कोई ऐसे लोग थे जिनमे वर्ण के प्रति पूर्वाग्रह नही था तो वह आर्य थे |”(अम्बेडकर वा. खंड ७ ,पृष्ठ३२०)
(ग) ब्राह्मणवाद ने प्रमुखत जो कार्य किया, वह अंतरजातीय विवाह और सहभोज को समाप्त करना जो प्राचीनकाल में चारो वर्णों में प्रचलित थी “(वही खंड ७ ,पृष्ठ १९४)
(घ) ” बोद्ध पूर्व चातुर्य वर्णव्यवस्था एक उदार व्यवस्था थी उसमे गुंजाइश थी| इसमें जहा चार विभिन्न वर्गों का अस्तित्व स्वीकार किया गया था वाहा इन वर्गों में आपस में विवाह आदि का निषेध नही था ….(वही ,खंड ७ ,पृष्ठ १७५)
(आ) चातुर्य वर्णव्यवस्था निंदनीय –
(क) चातुर्य वर्ण व्यवस्था से अधिक नीच सामजिक व्यवस्था कौनसी है ,जो लोगो को किसी भी कल्याण कारी कार्य करने से विकलांग बना देती है | इस बात में कोई अतिश्योक्ति नही है |(वही,खंड ६ पृष्ठ ९५)
(ख) ” चातुर्य वर्ण के प्रचारक ये बहुत सोच समझकर बताते है कि उनका वर्ण व्यवस्था जन्म के आधार पर नही बल्कि गुणों के आधार पर है | यहा पर मै पहले ही बताना चाहता हु भले ही यह गुणों के आधार पर हो,किन्तु यह आदर्श मेरे विचार से मेल नही खाता|”(वही ,खंड १,पृष्ठ ८१)
(३)वेदों की वर्ण व्यवस्था 
(अ) वेदों की वर्णव्यवस्था उत्तम और सम्मान जनक – 
(क) ” शुद्र आर्य समुदाय के अभिन्न,जन्मजात और सम्मनित सदस्य थे | यह बात यजुर्वेद के एक मन्त्र में उलेखित एक स्तुति से पुष्ट होती है |” (वही खंड ७ पृष्ठ ३२२)
(ख) ” शुद्र समुदाय का सदस्य होता था और वह समाज का सम्मानित सदस्य था “(वही खंड ७ ,पृष्ठ ३२२)
(ग) वर्णव्यवस्था की वैदिक पद्धति जाति व्यवस्था की अपेक्षा उत्तम थी (वही,खंड ७,पृष्ठ २१८)
(घ) ” वेद में वर्ण की धारणा का सारांस यह है कि व्यक्ति वह पेशा अपनाय ,जो उसकी योग्यता के लिए उपयुक्त हो ……..वैदिक वर्णव्यवस्था केवल योग्यता को मान्यता देती है ……वर्ण और जाति दो अलग अलग मान्यताये है ..(वही,खंड१,पृष्ठ ११९)
(आ) वेदों की वर्णव्यवस्था समाज विभाजन और असमानता का जनक – 
(क) “यह निर्विवाद है कि वेदों ने वर्ण व्यवस्था के सिद्धांत की रचना की है,जिसे पुरुष सूक्त नाम से जाना जाता है| यह दो मुलभुत तत्वों को मान्यता देता है | उसने समाज के चार भागो में विभाजन को एक आदर्श योजना के रूप में योजना के रूप में मान्यता दी है | उसने इस बात को भी मान्यता दी है कि इन चारो भागो के सम्बन्ध असमानता के आधार पर होने चाहिए |” (वही ,खंड ६, पृष्ठ १०५)
(ख) ” जाति प्रथा, वर्णव्यवस्था का नया संस्करण है,जिसे वेदों से आधार मिलता है|” (वही,खंड ९,पृष्ठ १६०)
(*४) वर्णव्यवस्था और जातिव्यवस्था का सम्बन्ध 
(अ) जातिव्यवस्था वर्ण व्यवस्था का विकृत रूप है –
(क) ” कहा जाता है कि जाति,वर्ण व्यवस्था का विस्तार है | बाद में मै बताऊंगा कि यह बकवास है| जाति वर्ण का विकृत स्वरूप है | यह विपरीत दिशा में प्रसार है | जात पात ने वर्णव्यवस्था को पूरी तरह विकृत कर दिया |”(वही , खंड १ पृष्ठ २६३)
(ख) “जातिप्रथा चातुर्य वर्ण का ,जो कि हिन्दू आदर्श है का विकृत रूप है |”(वही ,खंड १ ,पृष्ठ २६३)
(ग) “अगर मूल पद्धति का यह विकृत रूप केवल सामजिक व्यवहार तक सीमित रहता तो सहन हो सकता था| लेकिन ब्राह्मण धर्म इतना करने के बाद भी संतुष्ट नही रहा |उसने इस वर्ण के विकृत रूप को कानून बना डाला | (वही खंड ७,पृष्ठ२१६)
(आ) जाति व्यवस्था वर्णव्यवस्थ का विकास है –
(क) ” वर्णव्यवस्था जातिजननी है |”(वही ,खंड६ ,हिंदुत्व का दर्शन ,पृष्ठ ४३)
(ख) “कुछ समय तक ये केवल वर्ण ही रहे, कुछ समय तक वर्ण ही थे वे अब जातिया बन गये और ये ४ जातोय ४००० बन गयी |इस प्रकार आधुनिक जातिव्यवस्था प्राचीन वर्णव्यवस्था का विकास है |
(*५) शुद्र आर्य या अनार्य ?
(अ) शुद्र मनुमतानुसार आर्य ही थे 
(क) “धर्म सूत्रों की यह बात शुद्र अनार्य है नही माननी चाहिय| यह सिद्धात मनु और कौटिल्य के विपरीत है|”(शुद्रो की खोज पृष्ठ ४२ )
(ख) ” आर्य जातिया का अर्थ है चार वर्ण – ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य,शुद्र| दुसरे शब्दों में मनु चार वर्णों को आर्यवाद का सार मानते है |”……[ब्राह्मण: ,क्षत्रिय वैश्य: त्रयो वर्णों:”(मनु १०.०४ ]
यह श्लोक दो कारणों से अत्यंत महत्वपूर्ण है| एक तो इससे पता चलता है कि शुद्रो को भिन्न बताया है | दुसरे इससे पता चलता है कि शुद्र आर्य है|”(अम्बेडकर वा. खंड ८ पृष्ठ२१७)
(आ) शुद्र मनुमतानुसार अनार्य थे 
(क) “मनु शुद्रो का निरूपण इस प्रकार करता है,जैसे वे बहार से आने वाले अनार्य थे |”(वही,खंड ७ ,पृष्ठ ३१९ )
(*६) शुद्रो को वेदाध्यानन अधिकार 
(अ) वेदों में सम्मान पूर्वक शुद्रो का अधिकार था 
(क) “वेदों का अध्ययन करने के बारे में शुद्रो के अधिकारों के प्रश्न पर ‘छान्दोग्योपनिषद् उलेखनीय है|……एक समय ऐसा भी था,जब अध्ययन के सम्बन्ध में शुद्रो पर कोई प्रतिबन्ध नही था|”(वही ख्न्द७,पृष्ठ ३२४ )
(ख) ” केवल यही बात मही थी कि शुद्र वेदों का अधयन्न कर सकते थे| कुछ शुद्र ऐसे थे जिन्हें ऋषि पद प्राप्त था और जिन्होंने वेदमंत्रो की रचना की| कवष ऐलुष नामक ऋषि की कथा बहुत ही महत्वपूर्ण है | वह एक ऋषि था और ऋग्वेद के १० मंडल में उसके रचे अनेक मन्त्र है |”(वही,खंड ७ ,पृष्ठ ३२४)
(ग)”जहा तक उपनयन संस्कार और यज्ञोपवीत धारण करने का प्रश्न है, इस बात का कही कोई प्रमाण नही मिलता की यह शुद्रो के लिए वर्जित था| बल्कि संस्कार गणपति में इस बात का स्पष्ट प्रावधान है और कहा है कि शुद्रो के लिए उपनयन अधिकार है “(वही खंड ७,पृष्ठ ३२५-३२६)
(आ) वेदों में शुद्रो का अधिकार नही था 
(क)” वेदों के ब्राह्मणवाद में शुद्रो का प्रवेश वर्जित था,लेकिन भिक्षुओ के बौद्ध धर्म के द्वार शुद्रो के लिए खुले हुए थे |”( वही,खंड ७ पृष्ठ १९७)
(*७) शुद्र वेतनभोगी सेवक या पराधीन ?
(अ) शुद्र को उचित वेतन और जीविका दे 
(क) “शुद्र की क्षमता,उसका कार्य तथा उसके परिवार में उस पर निर्भर लोगो की संख्या को ध्यान में रखते हुए वे लोग उसे अपनी पारिवारिक सम्पति से उचित वेतन दे (मनु १०.१२४ )|” (अम्बेडकर वा.,खंड ६ ,पृष्ठ ६२ ; खंड ७ पृष्ठ २०१,खंड ७ पृष्ठ २३४,३१८ ,खंड ९,पृष्ठ ११६ ,१७८ )
(आ) शुद्र गुलाम था 
(क)”मनु ने गुलामी को मान्यता प्रदान की है |परन्तु उसने उसे शुद्र तक ही सीमित रखा |”(वही ,खंड ६,पृष्ठ ४५ )
(ख)”प्रत्येक ब्राह्मण शुद्र को दास कर्म करने के लिए बाध्य कर सकता है, चाहे उसने उसे खरीद लिया हो अथवा नही,क्यूंकि शुद्रो की सृष्टि ब्राह्मणों को दास बनने के लिए ही की है [मनु .८.४१३ ]”(वही खंड ७ ,पृष्ठ ३१८ )
(*८) शुद्र का सेवाकार्य स्वेच्छापूर्वक 
(अ) शुद्र सेवा कार्य में स्वतंत्र है –
(क)” ब्रह्मा ने शुद्रो के लिए एक ही व्यवसाय नियत किया है -विनम्रता पूर्वक तीन अन्य वर्णों की अर्थात ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य की सेवा करना [मनु ९.१९] |” (अम्बेडकर वा.,खंड ९ पृष्ठ १०५ ,१०९,१७७ ,खंड १३ पृष्ठ ३० )
(ख) “यदि शुद्र (जो ब्राह्मण की सेवा से अपना जीविका निर्वाह नही कर पाता ) और जीविका चाहता है तो वह क्षत्रिय की सेवा करे या वह किसी धनी वेश्य की सेवा करे (मनु १०,१२१ )|”(वही खंड ९ ,पृष्ठ ११६ ,११७ )
(आ) शुद्र को केवल ब्राह्मण की सेवा करनी है 
(क) “ब्रह्मा ने ब्राह्मणों  को शुद्र की सेवा करने के लिए ही शुद्रो की सृष्टि की है [मनु ८,४१३] |” (वही,खंड ७ ,पृष्ठ २०० ;पृष्ठ १७७ )

(*९) मनु की दंड व्यवस्था कौनसी है ?
(अ)ब्राह्मण सबसे अधिक दंडनीय और शुद्र सबसे कम –
(क) ” चोरी करने पर शुद्र को आठ गुना,वैश्य को सोलह गुना ,और क्षत्रिय को बतीस गुना पाप होता है |ब्राह्मण को ६४ गुना या १२८ गुना तक,इनमे से प्रत्येक को अपराध की प्रक्रति की जानकारी होती है [मनु ८.३३७ ]|”(वही ८.३३७ )
(आ ) ब्राह्मण दंडनीय नही है शुद्र अधिक 
(क) ” पुरोहित वर्ग के व्यभिचारी को प्राण दंड देने के बजाय उसका अपकीर्ति कर मुंडन करा देना चाहिय तथा इसी अपराध के लिए अन्य वर्गों को म्रत्यु दंड देना चाहिय (मनु ८.३७१)|(वही खंड ६,पृष्ठ ४९)
(ख) ” लेकिन न्यायप्रिय राजा तीन निचली जातियों के व्यक्तियों को केवल आर्थिक दंड देगा और उन्हें निष्कासित कर देगा,जिन्होंने मिथ्या साक्ष्य दिया है ,लेकिन ब्राह्मण को वे केवल निष्काषित करेगा (मनु ८.१२३,१२४ )(वही ,खंड ७,पृष्ठ १६१ ,२४५ )
(*१०) शुद्र का ब्राह्मण बनना 
(अ) आर्यों में शुद्र ब्राह्मण बन सकता था   
(क) ” इस प्रक्रिया में यह होता था कि जो लोग पिछली बार केवल शुद्र होने से बच जाते थे ,ये ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य होने के लिए चुने जाते थे, जबकि पिछली बार जो लोग ब्राह्मण ,क्षत्रिय ,वैश्य होने के लिए चुने जाते वे शुद्र होने के योग्य होने के कारण रह जाते थे | इस प्रकार वर्ण के व्यक्ति बदलते रहते थे |”(वही खंड ७ ,पृष्ठ १७० )
(ख) ” अन्य समाजो के समान भारतीय समाज भी चार वर्णों में विभाजित था |….इस बात पर विशेष ध्यान देना होगा की आरम्भ में यह अनिवार्य रूप से वर्ग विभाजन के अंतर्गत व्यक्ति दक्षता के आधार पर अपना वर्ण बदल सकता था और इसलिए वर्णों को व्यक्तियों के कार्य की परिवर्तनशीलता स्वीकार्य थी |”(वही ,खंड १ पृष्ठ ३१)
(ग) ” प्रत्येक शुद्र जो शुचिपूर्ण है,जो अपने से उत्कृष्ट का सेवक ,मृदुभाषी है ,अहंकार रहित है,और सदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है,वह उच्चतर जाति प्राप्त करता है (मनु ९.३३५)(वही ,खंड ९ ,पृष्ठ ११७ )
(आ) आर्यों में शुद्र ब्राह्मण नही बन सकता था 
(क) “आर्यों के समाज में शुद्र अथवा नीच जाति का मनुष्य कभी ब्राह्मण नही बन सकता था|”(अम्बेडकर वा.,खंड ७ ,पृष्ठ ९३ )
(ख) ” वैदिक शासन में शुद्र ब्राह्मण बनने की कभी आकांशा नही कर सकता था |”(वही ,खंड ७ ,पृष्ठ १९७ )
(ग) “उच्च वर्ण में जन्मे और निम्न वर्ण व्यक्ति की नियति उसका जन्मजात वर्ण ही है |”(वही ,खंड ६ ,पृष्ठ १४६ )
(*११) ब्राह्मण कौन हो सकता था ?
(अ) वेदों का विद्वान् ब्राह्मण होता था 
(क) “स्वयम्भू मनु ने ब्राह्मणों के कर्तव्य वेदाध्ययन,वेद की शिक्षा देना ,यज्ञ करना अन्य को यज्ञ में साहयता देना ,यदि वो धनी है तो दान देना और निर्धन है तो दान लेना निश्चित किया (मनु २.८८) |”(अम्बेडकर वा.खंड ७ ,पृष्ठ २३० ,खंड ६ ,पृष्ठ १४२ ,खंड ९ ,पृष्ठ १०४ ,खंड १३ ,पृष्ठ ३० )
(ख) “वर्ण के अधीन कोई ब्राह्मण मूढ़ नही हो सकता| ब्राह्मण के मूढ़ होने की सम्भावना तभी हो सकती है ,जब वर्ण जाति बन जाए ,अर्थात जब कोई जन्म के आधार पर ब्राह्मण हो जाता है |”(वही ,खंड ७ ,पृष्ठ १७३)
(आ) वेदाध्ययन से रहित मुर्ख भी ब्राह्मण होता था 
(क) “कोई भी ब्राह्मण जो जन्म से ब्राह्मण है अर्थात जिसने जिसने न तो वेदों का अधयन्न किया है न वेदों द्वारा अपेक्षित कोई कर्म किया है ,वह राजा के अनुरोध पर उसके लिए धर्म का निर्वचन कर सकता है अर्थात न्यायधीश के रूप में कार्य कर सकता है ,लेकिन शुद्र यह नही कर सकता चाहे कितना ही विद्वान् क्यूँ न हो (मनु ८.२०)|”(वही खंड ७ ,पृष्ठ ३१७ ,खंड ९ ,पृष्ठ १०९ ,१७६ ,खंड १३ ,३० )
(*१२) मनु स्मृति विषयक मान्यता 
(अ)मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीति शास्त्र है 
(क) “इस प्रकार मनुस्मृति कानून का ग्रन्थ है ….चुकी इसमें जाति का विवेचन है जो हिन्दू धर्म की आत्मा है,इसलिए यह धर्म ग्रन्थ है |”(वही खंड ७ ,पृष्ठ २२६)
(ख) “मनु स्मृति को धर्मग्रन्थ के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिय |”(वही खंड ७ ,पृष्ठ २२८)
(ग) “अगर नैतिकता और सदाचार कर्तव्य है, तब निस्सदेह नीतिशास्त्र का ग्रन्थ है |”(वही,खंड ७ ,पृष्ठ २२६)
(आ) मनुस्मृति धर्मग्रन्थ और नीतिशास्त्र नही है 
(क) “यह कहना कि मनुस्मृति एक धर्मग्रन्थ है,बहुत कुछ अटपटा लगता है|”(वही,खंड ७ ,पृष्ठ २२६)
(ख)”हम कह सकते है कि मनु स्मृति नियमो की एक संहिता है |……यह न तो नीति शास्त्र है और न ही धर्म ग्रन्थ है |(वही ,खंड ७ ,पृष्ठ २२४ )
(*१३) समाज में पुजारी की आवश्कयता 
(अ)पुजारी आवश्यक था बुद्ध धर्म के लिए 
(क) बौद्ध धर्म के समर्थन में डा. अम्बेडकर लिखते है –
“धर्म की स्थापना केवल प्रचार द्वारा ही हो सकती है |यदि प्रचार असफल हो जाय तो धर्म भी लुप्त हो जाएगा |पुजारी वर्ग वो चाहे कितना भी घृणास्पद हो धर्म प्रवर्तन के के लिए आवश्यक होता है| धर्म ,प्रचार के आधार पर ही रह सकता है | पुजारिय के बिना धर्म लुप्त हो जाता है |”(वही ,खंड ७ ,पृष्ठ १०८ )
(आ) हिन्दू धर्म में पुजारी नही हो 
हिन्दू धर्म का विरोध करते हुए वे लिखते है –
(क) “अच्छा होगा,यदि हिन्दुओ में पुरोहिताई समाप्त की जाय |”(वही ,खंड१,पृष्ठ १०१)
इस तरह हम देखते है कि अम्बेडकर जी की बातों में विरोधाभास था ..जबकि वे दुसरो के विरोधाभास को देख उन्हें पागल तक कहने से नही चुके थे जबकि उन्होंने खुद के कथन नही देखे जिनमे विरोधाभास था इस तरह जो अम्बेडकर जी दुसरो को कहते वो उन पर भी लागू होता है | उनके कथनों में आपसी विरोधाभास होने से वे प्रमाण की कोटि में नही आते है |
यह अम्बेडकर जी के बारे में निम्न बातें स्पष्ट होती है –
अम्बेडकर जी दो प्रकार की मनस्थति में जीते थे – जब उन का मन समीक्षात्मक होता तब वे तर्क पूर्ण मत प्रकट करते थे जब प्रतिशोधात्मक मत प्रकट होता तब वे सारी सीमाय लांध कर कटुतम शब्दों का प्रयोग करने लगते थे |उनका व्यक्तित्व बहु सम्पन्न किन्तु दुविधा पूर्ण ,समीक्षक किन्तु पुर्वाग्रस्त, चिंतक किन्तु भावुक ,सुधारक किन्तु प्रतिशोधात्मक थे |
संधर्भित ग्रन्थ एवम पुस्तक –
मनु बनाम अम्बेडकर – डा. सुरेन्द्र कुमार 

FROM VEDIC TO CLASSICAL SANSKRIT (DEVELOPMENT OR DECAY)

language change

FROM VEDIC TO CLASSICAL SANSKRIT (DEVELOPMENT OR DECAY)

Three is a word of difference between the Vedic language and the Classical Sanskrit of the epics, sastras, kavyas….. At times the meaning of a word may undergo a sea change !

IN TERMS OF WORDS

The word sachí for instance, is used in the classical Sanskrit for ‘lndra`s wife’, whereas in the Vedic Lexicon Nighantu, it is en-joined for ‘speech, wisdom, action’ (vide Nigh.)-

shachi

The words vrtra, asum are used in Sanskrit as the name of a Raksasa (and for ‘raksasa‘ in general), but in Vedic they are two epithets, usually, of ‘cloud’-

vrutra

The word ‘ahí‘ is used in Sanskrit for serpent, while in Vedic, it stands for cloud again. ahi

The word adri, parvata, giri are used in Sanskrit for mountain, but in Vedic they again denote cloud- adri

The word ghrta is used in Sanskrit for clarified butter, in Vedic for water-

ghrutam

 

In Sanskrit, the word visa is used for poison but, according to the Vedic Nighantu, it is one of the many names ofwater-

vish

ln Sanskrit, the Word varaha is used for ‘boar’, but in Vedic it is given for cloud-

varah

In Sankrit asman and gravan are used for stone, but in Vedic they are shown as denoting cloud-

ashma

The word dhara is used in Sanskrit for flow or current but in Vedic it is used for speech-

dhara

The word ghrtací is used in Sanskrit for dancing girl, but in Vedic it denotes night-

ghrut

The word gaya is used in Sanskrit for a particular place where oblations are offered, but in the Vedic Nighantu, gaya means progency, wealth, home.

gaya

IN TERMS OF GRAMMAR

On the score of grammar, Vedic naturally differs from Classical Sanskrit in extension as well as in depth. Panini’s Astadhyayi refers to this vedic freedom of scope through aphorisms like.

bahulam

 

bahulam 1

Quite a few among Western linguists and philosophers hold that there has always been a growth, a development and an evolution in language :

T. Burrow, for instance, says in Sanskrit Language, “Many [of the changes of meaning] occured in the natural growth of the language.”

F. Bopp, in Comparative Grammar 0f Sanskrit, Greek, Latin and Other Languages, vol. l, has used the word ‘development’, in this connection; “[Of] language in its Stages of being and march of development.

” A.B. Keith has also opted for the view ‘development’, saying: “From the language of the Rigveda one can trace a steady development to Classical Sanskrit.” (History of Sanskrit Literature.)

Some Indian philologists, too, who have followed Western Writers, have held the same view. For instance : “From the cry and onomatopoeia with their various combinations, by means of association and metaphor, we arrive at a Vocabulary, sufficient for the purpose of the primitive man”…”The small original stock is improved upon and added to by manipulation of various kinds, based upon the association of various kinds, and on metaphor”.

But, when we compare the most ancient Vedic language with the modem Classical Sanskrit, we find that, instead of ‘growth’ or ‘development’, there has been ‘decay’.

For instance : (1) in the Vedic Lexicon Nighantu, at 1.2 we find 57 synonyms of vac (speech) like-

shlok 1

 

shlok 2

Very few of them have survived in classical Sanskrit : Amara Kosa, for instance, gives only the following-

brahmi

lt is growth or decay ? Let the reader on his own decide.

To give yet another illustration, in Vedic 101 names are listed for ‘water’, including-

jambh

But in the Amara Kosa only 27 remain ;

aapah

There are 37 names of megha (cloud) in Nighantu, in the Amara Kosa only 15-

grava

Among the 26 names of karma (action, work), including-

ambh

-only 2 (karma and karyam) are found in the Amara Kosa.

 

Many more examples could be given to show how, down the centuries, it has not been a case of growth or development, but rather one of decay in language.

lt is gratifying to note that some distinguished western linguists also are opposed to this theory of growth or evolution in language. We cite four of them :

V. VENDRYES in his book Language observes : ‘Certainly, modern languages, such as English and French, rejoice in an extreme suppleness, ease and flexibility; but [accordingly] can we maintain that the classical tongues, like Greek or Latin, are inferior to [any of these] ? It [Greek] is a language whose very essence is godlike.. If we have once acquired the taste for it, all other languages seem harsh after it… The outward form of the Greek language is itself a delight to the soul. Never was a more beautiful instrument fashioned to express human thought.

WILLIAM JONES : ‘The Sanskrit language, whatever be its antiquity, is of a wonderful structure-more perfect than Greek, more copious than Latin, and more exquisitely refined than French or Spanish.’

MAX MULLER : says they have reduced the rich and powerful idiom of the poets of Veda to the meagre and impure jargon of the modem sepoy’.

He adds : “We are accustomed to call these changes ‘growth’ of language, but it would be more appropriate to call this a process of phonetic change or decay. ”

‘On the whole, the history of all the Aryan languages is nothing but a gradual process of decay.

‘Lecures on the Science of Language, vol.l

And GRAY, lastly, has to say this (Foundations of Language) :

‘In lndo-European, we find 8 distinct case-forms in Sanskrit; Greek and Lithuanian have 7, Hittite and Old Church Slavic 5, Old French and Modem English only 2, Albanian 4. And American and Old English 3. This reduction in the number of case-forms-with  the result that some of them take over the functions of one or more others-gives rise to the linguistic phrase now known as syncretism. The reason for this seems to be phonetic decay of the characteristic case-endings.’

‘the mother of languages’

VEDIC-THE MOTHER OF ALL LANGUAGES

From the study of many of the historical languages of the world we have been driven to the inevitable conclusion that it is not Classical Sanskrit (which of course is the first daughter of the mother), but Vedic, that is the mother of all languages of the world. A FEW EXAMPLES

1. Vasra-in Vedic and, in its slightly different or corrupt forms, in different languages of the world : The word [vasra] has been used in the Rigveda on the following occasions-vasra 1O.119.4; vasra’iva 1.33.2, 1.28.8; 2.34.15; 7.149.4; 1.37.11, 1.96.6; 6.7.7, 9.1.37, 10.75.4.

In the other Vedas also the word is used frequently. All commentators of Veda are unanimous in holding that the word is derived from V vasr ‘sabde‘ and stands for cow (lowing, ‘making sound’.

vashra

Now, it is to be noted that there is no mention of this word in the Amara Kosa, or in any other lexicon of Sanskrit; nor do we find it generally used in the classical literature. Withal, the word is used for `cow’ in the French, Spanish, Portuguese and Italian languages in slightly different (corrupt) forms.

ln French it is vache; in Spanish vaen : in Portugese vaca ; and in Italian la vaces. [Also, likewise, in the languages of Europe the words derived from go are used for English cow : Swedish ko ; Danish ko ; Dutch koe ; German kuh].

2. To take another example, we may examine Vedic ‘irman ‘ for ‘arm’.

lt is from this (irman) alone that the word ‘arm’ is derived. With its Swedish, Danish, Dutch and German variants in COD, for Apisali states in his Siksa (as also Bharate in his Natyasatra) that ‘sarva-mukha-sthaniyan a-varnam’ ! agni : ignis (Lat.).

3. Another very common word, which may be mentioned in this connection, is dama. According to Nighantu 3.4, it is a grhanama (home)-

jaaya

But in Sanskrit literature and in classical lexicons, like the Amarakosa, dama occurs nowhere in the sense of ‘home’ or ‘wife.’ And so we should not be surprised to find the word, with slight changes, used in several languages of Europe-English, Swedish, Danish, Dutch, German in the sense of ‘lady’ : dame, dane, dem. 4. mira (ocean) ‘submarine fire’ and also vadavagni ! ; German meer ; French la mer ; Spanish and Portugese mar. 5. apa’ ítí-‘karma’-nama (Nighantu. 2.1) ; opus (Latin), operation (English). These five exmples should suffice to show that Vedic is the most ancient-and accordingly, the mother-of all languages.   MULTIPLICATION OF LANGUAGES lf, Vedic is the universal mother (or foster-mother as some would like to call it), the question naturally arises : how these hundreds and thousands of languages and dialects have sprung up from that one source. How to explain their multifurcation ? The answer may be briefly given as follows (taking into consideration what native and foreign scholars have written on the subject) Some probable causes suggested are :   PROBABLE CAUSES (l) Physiological causes– when some people cannot pronounce some difficult sounds on account of some defect in the anatomy; (2) Geographical surroundings-sometimes making it difficult to pronounce words correctly (due to severe cold.); (3) Communication and Correspondence (difficulties)- people of distant lands also sometimes cause pidgin-like change(s) in the language and its pronunciation ; (4) Change of model-e.g., a new king may ascend the throne and his subjects begin copying his style ;   (5) Association-also causes change, Examples     (6) Analogy-is defined (by Vendryes) as “the power of other words in a languages to exempt any special word from the operation of phonetic laws or to compensate it for changes which those laws may press or produce.” 0ne clear instance of this change by analogy is cows. ln Old English it was spelt (inflected) as kine ; but, as table, book, boy and other words are formed by just adding an “s” at the end, so the plural of cow also became cows-(though foot did not become foots such as. (7) Economy of effort-with regular vagaries- (a) varna-viparyaya or ‘metathesis’ :     (b) varna-lopa (dropping out of a letter, usually owing to inadvertence) :       (c) samikarana-(assimilation) :     cf. Edward Sturtivant (Introduction to linguistic Science : “Of great linguistic importance is the assimilation of contiguous consonants” (d) viprakasa-(dissimilation) :     (e) svara-bhakti (hiatus) :     (f) agro’pajana-(prothesis)     (g) sthana-viparyaya-(interchange) :     The following verse, quoted by Durgacarya in his ‘gloss’ on the Nirukta(Ch. 1), gives in brief most of these ‘rules’ :     (1)    pro/epen/post-thesis ; (2) interchange ; (3) distortion ; (1)(4) elision; (5) ‘sense suggesting = engendering another sound!’. (1)In various fonns of P/’akrta and in English, Greek, Latin,Russian and other languages ‘changes’ have taken place according to the above ‘rules’. It is thus that words actually become corrupt and new languages spring up. Defective and imperfect scripts also have helped in the distortion of a ‘pure` language no less : (1)In Tamil (script) there are only k and n ; c and n ; t and n ; t and (1)n ; p and m. [In Arabic script there is no p.] (1)In English there is no provision for t, th, d dh, n ; (1)In French there is no room for t, th, d, dh, n. (1) PASTO & SANSKRIT Pashto is the language spoken by Pathans and allied tribals of the North-Western Frontier. The author learnt from a letter, received from the Vice-Chancellor of Peshawar University, some years back, that “here Sanskrit is compulsory for all students of languages, as it is thought here, said the letter that, abounding in Sanskrit Vocabulary as it is, Pashto cannot be mastered without a good grounding in Sanskrit.” Following is the list of some Sanskrit words, with their Pasto variants, to stress the point :                     Also, for ‘grandfather’ the Pashto is Nikoh-derived from ‘niskrodha’-free from anger and, therefore., loving ; likewise, for grandmother anniya ‘anna-datri“,? But, we are just suggesting ; nothing more.   SANSKRIT & SOUTH INDIAN LANGUAGES There are some words in the South Indian languages, which have their origin in Sanskrit. On studying Kasakrtsna-Dhatupatha-Vrtti with the gloss of Channa-Vira Kavi, we have come to know of these ‘suspected origins’ ever more clearly-ever more surely. It should be borne in mind that Kasakrtsna had been a South-Indian grammarian centuries before Panini, recording some 800 more roots, i.e., in addition to the 2000 found in Panini ! (1) amma / avva, tayi-mother : These are the words used for ‘mother’ in different parts of the country. Of these amma-(1) is considered by some a corruption of ‘amba’ ; but according to Kasakrtsna’s Dhatupathavrtti, it is derived from V amm ‘gatau’ (1.224) ; avva (2) from V avv-bandha-ne-palane (1-226) ;t’yt (3) from V tayr, ‘santana-palanayon’(1.493). [In Tamil the word used for mother, tadar, too appears to have come from the same root] In Marathi, the word used for ‘mother’ is dyt V ay gat au (1.485) (2) appa = pitar (in Kannada, Tulgu and some other South Indian languages) from V app palane ! (3) ammi-putrí from V amm gatau (Kannada). (4) akka ‘elder sister’ (Kan.) from V akk bandane + palane. (5) atta, mother-in-law ; attika, sister-in-law (Kan.) from V at gatau. (6) appa-‘elder brother’ (Kan.) from V ap sabde (1.206). (7) nathi, dog (Kan., Tam.) from V nin ‘prapane’. (8) dana, animal (Kan.) from V dhan ‘calane’. (9) hana = wealth, woman (Kan.) from V han sabde. (niskasya dasamo bhagah.) (10) duddu, money (Kan.) from V duddu dharane. (11) gíni, parrot (Kan.) from V gin sabde. (12) gande, wall (Kan.) from V gadi bandhane. (13) vayí, mouth (K. and Ta.) from V vay gatau. (14) ane, hand (K., Ta.) from V an prapane. (15) avu, cow (Tel.) from V av palane. cf. ava-ni=’gau’ (earth)! (16) nalla, good (Tam.) from V nall palane. (17) ganda-pati, husband (Kan.) from V gadí vadaníkadese (sahayyam karoti)-cheek-by-j owl. (18) guli, bull (Kan.) from V gul bhaksane. (19) gulle, bubble, foam (Kan.) from V gull bhavane(vivarte). (20) hammu, pride (Kan.) from V hammu gatau (brain-wave) (21) pandu, fruit (Tel.) from V padí gatau. (22) jenu, honey (moon face ?), Kan. from V jin sambhaktau ! (23) channa, honey, fair lady (Kan. et al) from V cann sambhaktau! (24) havu, serpent from V havva (ghost) Kan. (25) hedi, coward (Kan) from V hedr calane ?   VEDIC AND THE REST   Comparative lists of words of different European languages clearly establish the affinity of these languages to Sanskrit. The question remains to be answered is : what relationship Sanskrit bears   to the different languages of the world ? Is it Sister/aunt/mother of them? It is here that scholars widely differ. Max Muller : “Sanskrit, no doubt, has an immense advantage over all the other ancient languages of the East. lt is so attractive and has been so widely admired that it almost seems at times to excite a certain amount of feminine jealousy.. We are ourselves lndo-Europeans. In a certain sense we are still speaking and thinking Sanskrit ; or, more correctly, Sanskrit is like a dear aunt to us and [vasudhaiva kutumbakam] she [responsibly] takes the place of a mother who   is no more. [Chips from a German Workshop] vol. 5.   It (Sanskrit) is the most regular language known, and is especially remarkable-as containing the roots of the various languages of Europe-Greek, Latin, German, Slavonic, says Baron Cuvier in Lectures on the Natural Sciences.”   And here is what Adelung has to say in “Sanskrit Language”. “The great number of languages, which are said to owe their origin – or bear a close affinity-to Sanskrit, is truly astonishing and-is yet another proof of the latter’s high antiquity. Rudiger avers it to be the parent of upwards of a hundred languages and dialects among which he enumerates l2 Indian, 7 Median Persic, 2 Austric   Albanian, 7 Greek, 18 Latin, 14 Slavonic, and 6 Celtic Gallic. The various vocabularies, which we now possess as a result of laborious and learned investigations, render it pretty evident that Sanskrit has not only furnished words for all the languages of Europe, but forms a main feature in almost all those of the East. A host of writers have made it the immediate parent of the Greek and Latin and German families of languages [no less]   Bopp in Edinburgh Review, vol. 33, expresses his opinion that “At one time, Sanskrit was the one languages spoken all over the world.”   And lastly, to quote from W.C. Taylor’s “India in Greece” :   It was an astounding discovery that Hindustan possessed a language of unrivalled richness and variety, a language the parent of all those dialects that Europe has fondly called classical-the source alike of the Greek flexibility and the Roman strength, a philosophy compared with which lessons of Pythagoras are but of yesterday [in point of age, in point of enduring speculation], Plato’s boldest efforts [sound] tame and commonplace…a poetry more purely intellectual than any of which we had before any conception, and a system of science whose antiquity baffles all powers of astronomical calculations. This literature, with all its colossal proportions, which can scarcely be described with-out [a] semblance of bombast and exaggeration, claims of course, a place for itself-it stands alone, [has been] able to stand alone. Its literature seems exhaustless. The utmost [of] stretch-of-imagination can scarce comprehend its boundless mythology. Its philosophy, far from shunning, has touched upon every metaphysical difficulty [and has much to contribute on each and every issue].   lt is, thus, clear that many impartial linguists and philologists of the West also admit that Sanskrit is the mother (not sister or aunt) of all the important languages of the world. It is unfortunate that, even in India, not much attention is being paid to the study and spread of Sanskrit either by the people or by the Government. It is high time the study of Sanskrit is made compulsory at schools and in colleges, throughout the country.

‘मैं और मेरा परमात्मा’-मनमोहन कुमार आर्य

my god

ओ३म्

मैं और मेरा परमात्मा


 

एक शाश्वत प्रश्न है कि मैं कौन हूं। माता पिता जन्म के बाद से अपने शिशु को उसकी बौद्धिक क्षमता के अनुसार ज्ञान कराना आरम्भ कर देते हैं। जन्म के कुछ समय बाद से आरम्भ होकर ज्ञान प्राप्ति का यह क्रम  विद्यालय, महाविद्यालय आदि से होकर चलता रहता है और इसके बाद भी नाना प्रकार की पुस्तकें, धर्मोपदेश, व्याख्यान, पुस्तकों का अध्ययन व स्वाध्याय तथा भिन्न प्रकार की साधनाओं आदि से ज्ञान में वृद्धि होती रहती है। सब कुछ अध्ययन कर लेने के बाद भी यदि किसी शिक्षित बन्धु से पूछा जाये कि कृपया बतायें कि आप कौन हैं या मैं कौन हूं,   क्या हूं, कहां से माता के गर्भ में आया, फिर मेरा जन्म हो गया, युवा व वृद्ध होने के बाद किसी दिन मेरी मृत्यु हो जायेगी। मृत्यु के बाद मेरा अस्तित्व रहेगा या नहीं। यदि नहीं रहेगा तो क्यों नहीं रहेगा और यदि रहेगा तो कहां व किस प्रकार का होगा, आदि प्रश्नों का समाधान कर दें, तो हम समझते हैं कि आजकल की शिक्षा में दीक्षित किसी व्यक्ति के लिए इन साधारण प्रश्नों का समाधानकारक उत्तर देना सरल कार्य नहीं होगा। इससे तो यही निष्कर्ष निकलता है कि आजकल की शिक्षा अधूरी व अपूर्ण हैं। इसी कारण से लोग आध्यात्मिक जीवन का त्याग कर भौतिक जीवन शैली को अपनाने को विवश हुए हैं। इसके लिए हम तो यहां तक कहेंगे कि हमारे सभी धर्माचार्य इस बात के दोषी हैं कि उन्होंने देश विदेश में आत्मा सम्बन्धी सत्य ज्ञान को स्वयं भी प्राप्त नहीं किया और फिर प्रचार की बात तो बाद की है। जो लोग इस बात का दावा करते हैं कि वह इन प्रश्नों के उत्तर जानते हैं तो फिर वह इनका प्रचार क्यों नहीं करते, क्यों वह भौतिक व आडम्बर पूर्ण जीवन में व्यस्त व तल्लीन हैं, तो इसका उत्तर नहीं मिलता। वह ज्ञान किस काम का जिसका धारक व्यक्ति उसे अन्य किसी न तो दे और न प्रचार करें। विद्या तो दान देने से बढ़ती है और यदि उसे अपने तक सीमित कर दिया जाये तो व्यवहार में न होने के कारण वह स्वयं भी भूल सकता है और उसके बाद तो उसका विलुप्त होना अवश्यम्भावी है।

 

इन सभी प्रश्नों के उत्तर पहले वेद एवं वैदिक साहित्य के आधार पर जान लेते हैं। पहला प्रश्न कि मैं कौन और क्या हूं, इसका उत्तर है कि मैं एक जीवात्मा हूं जो अजन्मा, चेतन तत्व, सूक्ष्म, नित्य, अमर व अविनाशी, एकदेशी, कर्मानुसार जन्म व मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ, ईश्वर साक्षात्कार कर मुक्ति को प्राप्त होने वाला व मुक्ति की अवधि समाप्त होने पर पूर्व जन्म के अवशिष्ट कर्मों का फल भोगने के लिए जन्म धारण करने वाला है। मेरी यह सत्ता ईश्वर व मूल प्रकृति से सर्वथा भिन्न व स्वतन्त्र है। माता के गर्भ में आने में ईश्वर की प्रेरणा काम करती है। ईश्वर की प्रेरणा से पहले जीवात्मा जो पूर्व जन्म की किसी योनि में मृत्यु को प्राप्त कर अपने कर्मानुसार नये जन्म की प्रतीक्षा में है, पिता के शरीर में आता है। सन्तानोत्पत्ति से पूर्व गर्भाधान के अवसर पर यह पिता के शरीर से माता के शरीर में आता है। माता के शरीर या गर्भ में प्रसव की अवधि तक रहकर यह पुत्र या पुत्री के रूप में जन्म लेता है। शास्त्र यह भी बताते हैं कि जब हमारी मृत्यु होती है, उस समय यदि हमारे पुण्य कर्म पाप कर्मों के बराबर या अधिक होते हैं तो मनुष्य जन्म और यदि पुण्य कर्म कम होते हैं तो फिर पशु, पक्षी व अन्य निम्न योनियों में ईश्वर के द्वारा जन्म मिलता है। इस प्रकार से माता के गर्भ में आने के रहस्य का समाधान हमारे ऋषियों ने शास्त्रों में किया है जो पूर्णतः तर्क व युक्ति संगत है। हमारी जब भी मृत्यु होगी तो हमारे अजन्मा व अमर होने के कारण हमारा अस्तित्व समाप्त नहीं होगा अपितु हम शरीर से निकल कर इस वायु मण्डल व आकाश में एक जीव के रूप में सर्वव्यापक परमात्मा के साथ रहेगें। यह निवास हमें ईश्वर द्वारा पुनः जन्म देने के लिए हमारी भावी माता के गर्भ में भेजने के समय तक रहेगा। यहां यह प्रश्न भी किया जा सकता है कि यदि ऐसा है तो फिर हमें व अन्यों को पूर्व जन्म की बातें याद क्यों नहीं रहतीं। इसका उत्तर है कि हमारा जो मनुष्य जीवन है उसमें हम एक समय में एक ही बात को स्मरण रख सकते हैं। क्योंकि हम वर्तमान में इस जन्म की बातों व समृतियों से भरे हुए रहते हैं, इस कारण पूर्व जन्म की बातें स्मरण नहीं आतीं। दूसरा कारण है कि मृत्यु के बाद हमारा पुराना शरीर व उसमें हमारा जो मन, बुद्धि व चित्त था वह इस जन्म में बदल जाता है और उस जन्म से इस जन्म में बोलना सीखने की लम्बी अवधि में हम पुरानी बातों को भूल जाते हैं। यदि विचार करें तो हमें आज की ही बातें याद नहीं रहती। हम जो बोलते हैं, यदि कुछ मिनट वा एक घंटे बाद उसे पूरा का पूरा दोहराना हो तो हम पूर्णतः वही शब्द और वही वाक्य दोहरा नहीं सकते हैं। इसका कारण जो शब्द हम बोलते हैं, उसका क्रम साथ-साथ भूलते जाते हैं। हमने प्रातः क्या भोजन किया, दिन में क्या किया, किन-किन से मिले, क्या बातंे कीं, क्या पढ़ा, यदि कुछ लिखा तो क्या लिखा, उसे पूरा का पूरा, वैसा का वैसा, क्रमशः नहीं दोहरा सकते। रूक रूक कर याद करते हैं फिर भी बहुत सी बातें व उनका क्रम भूल जाते हैं। पूर्व दिनों व उससे पहले की घटनाओं को याद करने की बात ही कुछ और है। जब हमें अपने पूर्व के एक सप्ताह के व्यवहार का पूरा ज्ञान व स्मृति नहीं होती तो यदि पूर्व जन्म की स्मृति भी न रहे तो यह कौन से आश्चर्य की बात है। यह साध्य कोटि में है, असम्भव नहीं। अतः पूर्व जन्म के बारे में यह युक्ति कि हमें पूर्व जन्म की बातें याद क्यों नहीं होती, कोई अधिक बलवान तर्क नहीं हैं। अतः इस चिन्तन से हमें अपने स्वरूप का ज्ञान हो गया जो कि वेद शास्त्र सम्मत, बुद्धि, युक्ति आदि से प्रमाणित है।

 

अब हम अपने परमात्मा को भी जानने का प्रयास करते हैं। हम सभी अपने चारों ओर माता-पिता, कुटुम्बी, मित्रों और सामाजिक बन्धुओं को देखते हैं। इसके साथ हम पृथिवी, सूर्य, चन्द्रमा, जल, वायु, अग्नि आदि भिन्न प्रकार के तत्वों को भी देखते हैं। इन्हें देख कर विचार आता है कि सूर्य, चन्द्र व पृथिवी आदि व मनुष्य, पशु व पक्षी, वनस्पति, नदी, जल, वायु, अग्नि आदि को किसने बनाया है? मनुष्य व अन्य किसी योनि के प्राणियों ने तो बनाया नहीं? किस सत्ता के द्वारा यह बनाये गये हैं, इसका विचार कर निर्णय करना आवश्यक होता है। इसका उत्तर है कि जिस सत्ता ने हमें बनाया है, उसी ने वृक्ष आदि वनस्पतियों व इस सारे जगत एवं इसके सूर्य, पृथिवी, चन्द्र आदि ग्रह-उपग्रहादि सहित उन सभी सांसारिक पदार्थों को भी बनाया है जो कि कोई मनुष्य नहीं बना सकता। ऐसे पदार्थ जो संसार में हैं परन्तु मनुष्यों द्वारा नहीं बनाये जा सकते हैं वह अपौरूषेय रचनायें कहे जाते हैं। इनकी रचना या उत्पत्ति ईश्वर व परम-पुरूष परमात्मा से होती है। अत यहां पुनः वही प्रश्न उत्पन्न होता है कि यदि उसने बनायें हैं तो वह दिखाई क्यों नहीं देता। उसका उत्तर भी यही है कि सर्वातिसूक्ष्म होने से वह दिखाई नहीं देता। आंखों से केवल स्थूल पदार्थ ही दिखाई देते हैं, सूक्ष्म व परमसूक्ष्म पदार्थ नहीं। वायु और इसमें विद्यमान अणु-परमाणु किसी को कहां दिखाई देते हैं फिर भी इनका अस्तित्व है और सभी इसको स्वीकार करते हैं। त्वचा से स्पर्श होने पर वायु की अनुभूति होती है। इसी प्रकार ईश्वर का दिखाई देना भी उसके कार्यों को देखकर किया जाता है। यदि हम एक सुन्दर सा फूल देखते हैं तो हमें उसकी सुन्दरता व सुगन्ध आकर्षित करती है। हम कितना ही प्रयास कर लें, हम उसी प्रकार की रचना नहीं कर सकते। अतः रचना को देखकर रचयिता का अस्तित्व स्वीकार करना पड़ता है।

 

यहां एक विज्ञान व दर्शन का नियम भी कार्य करता है जिसे यदि समझ लिया जाये तो गुत्थी हल हो जाती है। नियम यह है कि किसी भी पदार्थ के गुणों का प्रत्यक्ष होता है, गुणी का नहीं। हम फूल के रूप में फूल के रंग-रूप का ही तो दर्शन करते हैं। परन्तु यह तो रंग-रूप व बनावट तो उस फूल के गुण है न की फूल। गुणों का दर्शन हो रहा है न की गुणी का। इसके समान गुण हमें जहां मिलते हैं हम उसे अमुक नाम का फूल कह देते है परन्तु हमें उस फूल नामी गुणी का प्रत्यक्ष नहीं होता। इसी प्रकार से ईश्वर के गुणों को देखकर उसकी पहचान की जाती है। जैसे की सूर्य में इसकी रचना को देखकर ईश्वर का ज्ञान होता है। सूर्य की रचना उस परमात्मा नामी गुणी का गुण है। इसी प्रकार से फूल को देखकर इसके रचयिता ईश्वर का ज्ञान विवेकशील मनुष्यों को होता है। ऐसा ही सभी जगहों पर माना जा सकता है। दर्शनकार ने ईश्वर की परिभाषा देते हुए कहा है कि जिससे यह संसार जन्म लेता है, जो इसको चलाता है और जो अवधि पूरी होने पर इसका संहार या प्रलय करता है, उसी को ईश्वर कहते हैं। इसी प्रकार से किसी वस्तु के बनाने में तीन कारण होते हैं। पहला निमित्त कारण, दूसरा उपादान कारण और तीसरा साधारण कारण कहलाता है। एक घड़े के निर्माण में कुम्हार निमित्त कारण, मिट्टी उपादान कारण व कुम्हार का चाक व उन्य उपकरण साधारण कारण कहे जाते हैं। इसी प्रकार से संसार को बनाने में ईश्वर निमित्त कारण, मूल प्रकृति उपादान कारण है। मनुष्य को अल्पज्ञ व अल्पशक्तिवान होने से साधारण कारणों, उपकरण आदि का सहारा लेना पड़ा है परन्तु ईश्वर के सर्वव्यापक, सर्वातिसूक्ष्म, सर्वान्तरर्यामी व सर्वशक्तिमान होने के कारण उसे साधारण कारणों के रूप में उपकरणों आदि की आवश्यकता नहीं होती। इससे ज्ञात होता है कि संसार की उत्पत्ति ईश्वर से होती है। इसको यदि विस्तृत रूप से जानना हो तो कह सकते हैं कि ईश्वर सच्चिदानन्दस्वरूप, सर्वज्ञ, निराकार, सर्वशक्तिमान, न्यायकारी, दयालु, अजन्मा, अनन्त, निर्विकार, अनादि, अनुपम, सर्वाधार, सर्वेश्वर, सर्वान्तर्यामी, अजर, अमर, अभय, नित्य, पवित्र और सृष्टिकर्ता है। यह ईश्वर का स्वरूप व उसके गुण आदि हैं। यही हमारे परमात्मा का भी स्वरूप है। इसी परमात्मा के द्वारा हमारा यह संसार बना है। इसी से हमारा जन्म व मृत्यु और पुनर्जन्म होता है। हमें हमारे कर्मानुसार जन्म देने के लिए हम ईश्वर के ऋणी है। इस ऋण को चुकाने के लिए हमें ईश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव रखकर उसके गुणों का चिन्तन व ध्यान करना है जिससे हमें सत्य व असत्य का ज्ञान हो सके। सत्य का आचरण ही धर्म कहलाता है जिसे वेद व सत्यार्थ प्रकाश आदि शास्त्रों को पढ़कर जाना जा सकता है। आजकल हमारे देश व विश्व में सत्य के साथ असत्य ज्ञान की पुस्तकें भी धर्म ग्रन्थ के नाम से प्राप्तव्य हैं। साधारण ही नहीं अपितु शिक्षित जनों के लिए भी सत्य का निर्धारण करना कठिन कार्य है। इसके लिए वेद, उपनिषद तथा दर्शन आदि ग्रन्थों सहित सत्यार्थ प्रकाश, ऋग्वेदादिभाष्य भूमिका व संस्कार विधि आदि ग्रन्थ परम सहायक हैं। यदि हम इनका नियमित स्वाध्याय करें तो फिर हमें कहीं किसी गुरू के पास जाने की आवश्यकता नहीं है। ज्ञान हमारी आत्मा में स्वतः उतर आता है। इसका लाभ लेकर हम सत्य का निर्धारण कर सत्य का पालन कर सकते है और अपने जीवन को सफल कर सकते हैं।

 

मनमोहन कुमार आर्य

पताः 196 चुक्खूवाला-2

देहरादून-248001

                                                फोनः 09412985121

अम्बेडकर द्वारा मनु स्मृति के श्लोको के अर्थ का अनर्थ कर गलत या विरोधी निष्कर्ष निकालना (अम्बेडकर का छल )

डा. अम्बेडकर ने अपने ब्राह्मण वाद से घ्रणा के चलते मनुस्मृति को निशाना बनाया और इतना ही नही अपनी कटुता के कारण मनुस्मृति के श्लोको का गलत अर्थ भी किया …अब चाहे अंग्रेजी भाष्य के कारण ऐसा हुआ हो या अनजाने में लेकिन अम्बेडकर जी का वैदिक धर्म के प्रति नफरत का भाव अवश्य नज़र आता है कि उन्होंने अपने ही दिए तथ्यों की जांच करने की जिम्मेदारी न समझी |
यहाँ आप स्वयम देखे अम्बेडकर ने किस तरह गलत अर्थ प्रस्तुत कर गलत निष्कर्ष निकाले –
(१) अशुद्ध अर्थ करके मनु के काल में भ्रान्ति पैदा करना और मनु को बोद्ध विरोधी सिद्ध करना –
(क) पाखण्डिनो विकर्मस्थान वैडालव्रतिकान् शठान् |
हैतुकान् वकवृत्तीश्र्च वाङ्मात्रेणापि नार्चयेत् ||(४.३०)
डा . अम्बेडकर का अर्थ – ” वह (गृहस्थ) वचन से भी विधर्मी, तार्किक (जो वेद के विरुद्ध तर्क करे ) को सम्मान न दे|”
” मनुस्मृति में बोधो और बुद्ध धम्म के विरुद्ध में स्पष्ट व्यवस्था दी गयी है |”
(अम्बेडकर वा. ,ब्राह्मणवाद की विजय पृष्ठ. १५३)
शुद्ध अर्थ – पाखंडियो, विरुद्ध कर्म करने वालो अर्थात अपराधियों ,बिल्ली के सामान छली कपटी जानो ,धूर्ति ,कुतर्कियो,बगुलाभक्तो को अपने घर आने पर वाणी से भी सत्कार न करे |
समीक्षा- इस श्लोक में आचारहीन लोगो की गणना है उनका वाणी से भी अतिथि सत्कार न करने का निर्देश है |
यहा विकर्मी अर्थात विरुद्ध कर्म करने वालो का बलात विधर्मी अर्थ कल्पित करके फिर उसका अर्थ बोद्ध कर लिया |विकर्मी का विधर्मी अर्थ किसी भी प्रकार नही बनता है | ऐसा करके डा . अम्बेडकर मनु को बुद्ध विरोधी कल्पना खडी करना चाहते है जो की बिलकुल ही गलत है |
(ख) या वेदबाह्या: स्मृतय: याश्च काश्च कुदृष्टय: |
सर्वास्ता निष्फला: प्रेत्य तमोनिष्ठा हि ता: स्मृता:|| (१२.९५)
डा. अम्बेडकर का अर्थ – जो वेद पर आधारित नही है, मृत्यु के बाद कोई फल नही देती, क्यूंकि उनके बारे में यह घोषित है कि वे अन्धकार पर आधारित है| ” मनु के शब्द में विधर्मी बोद्ध धर्मावलम्बी है| ” (वही ,पृष्ठ१५८)
शुद्ध अर्थ – ‘ वेदोक्त’ सिद्धांत के विरुद्ध जो ग्रन्थ है ,और जो कुसिधान्त है, वे सब श्रेष्ट फल से रहित है| वे परलोक और इस लोक में अज्ञानान्ध्कार एवं दुःख में फसाने वाले है |
समीक्षा- इस श्लोक में किसी भी शब्द से यह भासित नही होता है कि ये बुद्ध के विरोध में है| मनु के समय अनार्य ,वेद विरोधी असुर आदि लोग थे ,जिनकी विचारधारा वेदों से विपरीत थी| उनको छोड़ इसे बुद्ध से जोड़ना लेखक की मुर्खता ओर पूर्वाग्रह दर्शाता है |
(ग) कितवान् कुशीलवान् क्रूरान् पाखण्डस्थांश्च मानवान|
विकर्मस्थान् शौण्डिकाँश्च क्षिप्रं निर्वासयेत् पुरात् || (९.२२५)
डा. अम्बेडकर का अर्थ – ” जो मनुष्य विधर्म का पालन करते है …….राजा को चाहिय कि वह उन्हें अपने साम्राज्य से निष्कासित कर दे | “(वही ,खंड ७, ब्राह्मणवाद की विजय, पृष्ठ. १५२ )
शुद्ध अर्थ – ‘ जुआरियो, अश्लील नाच गाने करने वालो, अत्याचारियों, पाखंडियो, विरुद्ध या बुरे कर्म करने वालो ,शराब बेचने वालो को राजा तुरंत राज्य से निकाल दे |
समीक्षा – संस्कृत पढने वाला छोटा बच्चा भी जानता है कि कर्म, सुकर्म ,विकर्म ,दुष्कर्म इन शब्दों में कर्म ‘क्रिया ‘ या आचरण का अर्थ देते है | यहा विकर्म का अर्थ ऊपर बताया गया है | लेकिन बलात विधर्मी और बुद्ध विरोधी अर्थ करना केवल मुर्खता प्राय है |
(२) अशुद्ध अर्थ कर मनु को ब्राह्मणवादी कह कर बदनाम करना –
(क) सेनापत्यम् च राज्यं च दंडेंनतृत्वमेव च|
सर्वलोकाघिपत्यम च वेदशास्त्रविदर्हति||(१२.१००)
डा. अम्बेडकर का अर्थ – राज्य में सेना पति का पद, शासन के अध्यक्ष का पद, प्रत्येक के ऊपर शासन करने का अधिकार ब्राह्मण के योग्य है|’ (वही पृष्ठ १४८)
शुद्ध अर्थ- ‘ सेनापति का कार्य , राज्यप्रशासन का कार्य, दंड और न्याय करने का कार्य ,चक्रवती सम्राट होने, इन कार्यो को करने की योग्यता वेदों का विद्वान् रखता है अर्थात वाही इसके योग्य है |’
समीक्षा – पाठक यहाँ देखे कि मनु ने कही भी ब्राह्मण पद का प्रयोग नही किया है| वेद शास्त्र के विद्वान क्षत्रिय ओर वेश्य भी होते है| मनु स्वयम राज्य ऋषि थे और वेद ज्ञानी भी (मनु.१.४ ) यहा ब्राह्मण शब्द जबरदस्ती प्रयोग कर मनु को ब्राह्मणवादी कह कर बदनाम करने का प्रयास किया है |
(ख) कार्षापण भवेद्दण्ड्यो यत्रान्य: प्राकृतो जन:|
तत्र राजा भवेद्दण्ड्य: सहस्त्रमिति धारणा || (८.३३६ )
डा. अम्बेडकर का अर्थ – ” जहा निम्न जाति का कोई व्यक्ति एक पण से दंडनीय है , उसी अपराध के लिए राजा एक सहस्त्र पण से दंडनीय है और वह यह जुर्माना ब्राह्मणों को दे या नदी में फैक दे ,यह शास्त्र का नियम है |(वही, हिन्दू समाज के आचार विचार पृष्ठ२५० )
शुद्ध अर्थ – जिस अपराध में साधारण मनुष्य को एक कार्षापण का दंड है उसी अपराध में राजा के लिए हज़ार गुना अधिक दंड है | यह दंड का मान्य सिद्धांत है |
समीक्षा :- इस श्लोक में अम्बेडकर द्वारा किये अर्थ में ब्राह्मण को दे या नदी में फेक दे यह लाइन मूल श्लोक में कही भी नही है ऐसा कल्पित अर्थ मनु को ब्राह्मणवादी और अंधविश्वासी सिद्ध करने के लिए किया है |
(ग) शस्त्रं द्विजातिभिर्ग्राह्यं धर्मो यत्रोपरुध्यते |
द्विजातिनां च वर्णानां विप्लवे कालकारिते|| (८.३४८)
डा. अम्बेडकर का अर्थ – जब ब्राह्मणों के धर्माचरण में बलात विघ्न होता हो, तब तब द्विज शस्त्र अस्त्र ग्रहण कर सकते है , तब भी जब द्विज वर्ग पर भयंकर विपति आ जाए |” (वही, हिन्दू समाज के आचार विचार, पृष्ठ २५० )
शुद्ध अर्थ:- ‘ जब द्विजातियो (ब्राह्मण,क्षत्रिय ,वैश्य ) धर्म पालन में बाँधा उत्पन्न की जा रही हो और किसी समय या परिस्थति के कारण उनमे विद्रोह उत्पन्न हो गया हो, तो उस समय द्विजो को शस्त्र धारण कर लेना चाहिए|’
समीक्षा – यहाँ भी पूर्वाग्रह से ब्राह्मण शब्द जोड़ दिया है जो श्लोक में कही भी नही है |
(३) अशुद्ध अर्थ द्वारा शुद्र के वर्ण परिवर्तन सिद्धांत को झूटलाना |
(क) शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुः मृदुवागानहंकृत: |
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्रुते|| (९.३३५)
डा. अम्बेडकर का अर्थ – ” प्रत्येक शुद्र जो शुचि पूर्ण है, जो अपनों से उत्कृष्ट का सेवक है, मृदु भाषी है, अंहकार रहित हैसदा ब्राह्मणों के आश्रित रहता है (अगले जन्म में )  उच्चतर जाति प्राप्त करता है |”(वही ,खंड ९, अराजकता कैसे जायज है ,पृष्ठ ११७)
शुद्ध अर्थ – ‘ जो शुद्र तन ,मन से शुद्ध पवित्र है ,अपने से उत्क्रष्ट की संगती में रहता है, मधुरभाषी है , अहंकार रहित है , और जो ब्राह्मणाआदि तीनो वर्णों की सेवा कार्य में लगा रहता है ,वह उच्च वर्ण को प्राप्त कर लेता है|
समीक्षा – इसमें मनु का अभिप्राय कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था का है ,जिसमे शुद्र उच्च वर्ण प्राप्त करने का उलेख है , लेकिन अम्बेडकर ने यहाँ दो अनर्थ किये – ” श्लोक में इसी जन्म में उच्च वर्ण प्राप्ति का उलेख है अगले जन्म का उलेख नही है| दूसरा श्लोक में ब्राह्मण के साथ अन्य तीन वर्ण भी लिखे है लेकिन उन्होंने केवल ब्राह्मण लेकर इसे भी ब्राह्मणवाद में घसीटने का गलत प्रयास किया है |इतना उत्तम सिधांत उन्हें सुहाया नही ये महान आश्चर्य है |
(४) अशुद्ध अर्थ करके जातिव्यवस्था का भ्रम पैदा करना 
(क) ब्राह्मण: क्षत्रीयो वैश्य: त्रयो वर्णों द्विजातय:|
चतुर्थ एक जातिस्तु शुद्र: नास्ति तु पंचम:||
डा. अम्बेडकर का अर्थ- ” इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि मनु चातुर्यवर्ण का विस्तार नही चाहता था और इन समुदाय को मिला कर पंचम वर्ण व्यवस्था के पक्ष में नही था| जो चारो वर्णों से बाहर थे|” (वही खंड ९, ‘ हिन्दू और जातिप्रथा में उसका अटूट विश्वास,’ पृष्ठ१५७-१५८)
शुद्ध अर्थ – विद्या रूपी दूसरा जन्म होने से ब्राह्मण ,वैश्य ,क्षत्रिय ये तीनो द्विज है, विद्यारुपी दूसरा जन्म ना होने के कारण एक मात्र जन्म वाला चौथा वर्ण शुद्र है| पांचवा कोई वर्ण नही है|
समीक्षा – कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था ,शुद्र को आर्य सिद्ध करने वाला यह सिद्धांत भी अम्बेडकर को पसंद नही आया | दुराग्रह और कुतर्क द्वारा उन्होंने इसके अर्थ के अनर्थ का पूरा प्रयास किया |
(५) अशुद्ध अर्थ करके मनु को स्त्री विरोधी कहना |
(क) न वै कन्या न युवतिर्नाल्पविध्यो न बालिश:|
होता स्यादग्निहोतरस्य नार्तो नासंस्कृतस्तथा||( ११.३६ )
डा. अम्बेडकर का अर्थ – ” स्त्री वेदविहित अग्निहोत्र नही करेगी|” (वही, नारी और प्रतिक्रान्ति, पृष्ठ ३३३)
शुद्ध अर्थ – ‘ कन्या ,युवती, अल्पशिक्षित, मुर्ख, रोगी, और संस्कार में हीन व्यक्ति , ये किसी अग्निहोत्र में होता नामक ऋत्विक बनने के अधिकारी नही है|
समीक्षा – डा अम्बेडकर ने इस श्लोक का इतना अनर्थ किया की उनके द्वारा किया अर्थ मूल श्लोक में कही भव ही नही है | यहा केवल होता बनाने का निषद्ध है न कि अग्निहोत्र करने का |
(ख) सदा प्रहृष्टया भाव्यं गृहकार्येषु दक्षया |
सुसंस्कृतोपस्करया व्यये चामुक्तह्स्त्या|| (५.१५०)
डा. अम्बेकर का अर्थ – ” उसे सर्वदा प्रसन्न ,गृह कार्य में चतुर , घर में बर्तनों को स्वच्छ रखने में सावधान तथा खर्च करने में मितव्ययी होना चाहिय |”(वही ,पृष्ठ २०५)
शुद्ध अर्थ -‘ पत्नी को सदा प्रसन्न रहना चाहिय ,गृहकार्यो में चतुर ,घर तथा घरेलू सामान को स्वच्छ सुंदर रखने वाली और मित्यव्यी होना चाहिय |
समीक्षा – ” सुसंस्कृत – उपस्करया ” का बर्तनों को स्वच्छ रखने वाली” अर्थ अशुद्ध है | ‘उपस्कर’ का अर्थ केवल बर्तन नही बल्कि सम्पूर्ण घर और घरेलू सामान जो पत्नीं के निरीक्षण में हुआ करता है |
(६) अशुद्ध अर्थो से विवाह -विधियों  को विकृत करना 
(क) (ख) (ग) आच्छद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम्|
आहूय दान कन्यायाः ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तित:||(३.२७)
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते|
अलकृत्य सुतादान दैव धर्म प्रचक्षते||(३.२८)
एकम गोमिथुंनं द्वे वा वराददाय धर्मत:|
कन्याप्रदानं विधिविदार्षो धर्म: स उच्यते||(३.२९)
डा अम्बेडकर का अर्थ – बाह्म  विवाह के अनुसार किसी वेदज्ञाता को वस्त्रालंकृत पुत्री उपहार में दी जाती थी| देव विवाह  था जब कोई पिता अपने घर यज्ञ करने वाले पुरोहित को दक्षिणास्वरूप अपनी पुत्री दान कर देता था | आर्ष विवाह के अनुसार वर, वधु के पिता को उसका मूल्य चूका कर प्राप्त करता था|”( वही, खंड ८, उन्नीसवी पहेली पृष्ठ २३१)
शुद्ध अर्थ – ‘वेदज्ञाता और सदाचारी विद्वान् कन्या द्वारा स्वयम पसंद करने के बाद उसको घर बुलाकर वस्त्र और अलंकृत कन्या को विवाहविधिपूर्वक देना ‘ बाह्य विवाह’ कहलाता है ||’
‘ आयोजित विस्तृत यज्ञ में ऋत्विज कर्म करने वाले विद्वान को अलंकृत पुत्री का विवाहविधिपूर्वक कन्यादान करना’ दैव विवाह ‘ कहाता है ||”
‘ एक या दो जोड़ा गाय धर्मानुसार वर पक्ष से लेकर विवाहविधिपूर्वक कन्यादान करना ‘आर्ष विवाह ‘ है |’ आगे ३.५३ में गाय का जोड़ा लेना वर्जित है मनु के अनुसार
समीक्षा – विवाह वैदिक व्यवस्था में एक संस्कार है | मनु ने ५.१५२ में विवाह में यज्ञीयविधि का विधान किया है | संस्कार की पूर्णविधि करके कन्या को पत्नी रूप में ससम्मान प्रदान किया जाता है | इन श्लोको में इन्ही विवाह पद्धतियों का निर्देश है | अम्बेडकर ने इन सब विधियों को निकाल कर कन्या को उपहार , दक्षिणा , मूल्य में देने का अशुद्ध अर्थ करके सम्मानित नारी से एक वस्तु मात्र बना दिया | श्लोको में यह अर्थ किसी भी दृष्टिकोण से नही बनता है | वर वधु का मूल्य एक जोड़ा गाय बता कर अम्बेडकर ने दुर्भावना बताई है जबकि मूल अर्थ में गाय का जोड़ा प्रेम पूर्वक देने का उलेख है क्यूंकि वैदिक संस्कृति में गाय का जोड़ा श्रद्धा पूर्वक देने का प्रतीक है |
अम्बेडकर द्वारा अपनी लिखी पुस्तको में प्रयुक्त मनुस्मृति के श्लोको की एक सारणी जिसके अनुसार अम्बेडकर ने कितने गलत अर्थ प्रयुक्त किये और कितने प्रक्षिप्त श्लोको का उपयोग किया और कितने सही श्लोक लिए का विवरण –

 

 उपरोक्त
वर्णन के आधार पर स्पष्ट है कि अम्बेडकर ने मनु स्मृति के कई श्लोको के गलत अर्थ प्रस्तुत कर मन मानी कल्पनाय और आरोप गढ़े है | ऐसे में अम्बेडकर निष्पक्ष लेखक न हो कर कुंठित व्यक्ति ही माने जायेंगे जिन्होंने खुद भी ये माना है की उनमे कुंठित भावना थी | जो कि इसी ब्लॉग पर बाबा साहब की बेवाक काबिले तारीफ़ नाम से है | इन सब आधारों पर अम्बेडकर के लेख और समीक्षाय अप्रमाणिक ही कही जायेंगी |
संधर्भित पुस्तके – (१) मनु बनाम अम्बेडकर-डा. सुरेन्द्र कुमार
(२) मनुस्मृति और अम्बेडकर – डा.के वी पालीवाल …..

 

Vedas For Beginners : Why be devoted to God?

K:  Sister! Please reply to yesterday’s question.

 

V:  Why to remain devoted to God? And why should we praise and pray Him was your yesterday’s question.

Well.  All things in the world aspire to get drawn towards its Primary source or centre of Power. This is applicable equally to both Conscious [chetan] and non-conscious or inert [Jada] bodies. Fire moves up and up for the reason that the Sun is the primary source of heat or Fire. Now consider another example. Throw a mud ball towards the Sky and however high it is thrown up ultimately it lands on the earth because Earth is the prime source of mud. Water gets evaporated from sea, because of Sun and the water so evaporated becomes a cloud. It starts raining and the water enters the rivers which ultimately join the sea, because sea is the prime source of water. So is the case of other materials also. Every material has its prime source.

Ocean is the Prime centre of water

Sun is the treasure house/ source of Fire

Sky is the Prime centre of Wind

Earth is the source of soil

 

Similarly Knowledge also has its prime source in the world. That is god. All the knowledge that man has acquired has been got from God. If a man could acquire the knowledge by himself without others assistance there was no necessity for schools, colleges, universities etc. Teachers were also found then not necessary. But this is not the case. Parents teach their children to talk and make them aware of so many things that surround them. They teach their children, how to eat, drink, dress etc. Behavior, etiquettes, inter-personal relationships etc are also taught. When these children enter schools they learn many other things. Here it should be also noted that what the teachers teach is also not theirs but what they would have learnt while at home, Schools and colleges before becoming teachers. Here a question arises. When the knowledge the men acquire is thru others who taught the human beings or the primary man at the time of Creation when there were no people before them? The answer is they got the knowledge from God only. Then how the Knowledge was given? How he taught them since He had no body? Here it may be clarified, that there exists a difference between revealing the knowledge and imparting them.  Teaching is done through sound and knowledge is revealed in heart. Since God is all pervading He is present in the human beings created at the time of Creation. Accordingly, God reveals the Knowledge in the souls of chosen Rishis Viz, Agni, Vayu, Aditya and Angira. These Rishis in turn teach the knowledge for others through the medium of Sound. Then starts the mechanism of teaching, i.e. reading and hear them reading, reciting etc.

If God had not given the knowledge, the tradition of transmission of knowledge would not have come off. It is therefore clear that whatever knowledge that man has acquired is thru the process of transmission only and whatever enlightenment he has obtained has become possible thru god given intelligence and by observing the nature of world created by god. Man can enhance the boundaries of knowledge but so long he is not administered knowledge he cannot obtain himself. In the beginning of Creation God has revealed the knowledge in the hearts and minds of Rishis in seed form. Subsequent growth of knowledge in expanded form [Tree form] is rendered possible thru the efforts of Rishis   and intelligent men. This is the rule from time immemorial and the same will continue in future also. When all things in the world are aspiring to get drawn to its prime source and still at it, why the soul with finite knowledge would not wish to move towards God who is the repository and source of infinite knowledge? This is because his evolution is not at all possible sans God. Conscious bodies evolve with conscious bodies and unconscious [inert] bodies with inert bodies.

 

The welfare of conscious soul is not possible by any inert things in the world. It is true however, that by intelligently utilizing the inert matters the well being of body is definitely ensured. The soul however, bound as it is by limited knowledge [i.e. remaining Alpagna] seeks improvement in the worldly things but fails.  Hence he remains restless. Ignorance is the reason for unhappiness in the world. If soul were to understand the true nature of materials obtaining in the world, he will not experience unhappiness or sorrow. The soul becomes enmeshed in sorrow and shackles so long it keeps equating untruth to truth, ignorance to knowledge and conscious to inanimate. God who is the source of knowledge is the real source of happiness. Removed from God happiness does not lie in worldly things. If happiness could be found in worldly things then the entire world should have looked happy and cheerful. But the actual position is different. Every conscious being in the world seeks happiness, because it is not with him.  Why he should seek happiness if he already had?  He becomes  liberated with worldly sorrows and bondages and attains eternal happiness called Bliss[Ananda] in the end when while remaining devoted  keeps on doing praise[ Stuti] prayer[ Prarthana]and communion[ Upaasana]

 

K: It is wrong to say that there is no pleasure or happiness in the worldly things. If there were to be no happiness in them, then why they should be much sought after by men? If money were not to bring happiness why people would have struggled to accumulate it? If food were not cause happiness why they would have consumed it? Why wear clothes if they were not to cause happiness? Why construct Homes if they were not to bring in pleasure and happiness?  All this indicate that there is happiness in worldly things. Hence, people desire to have them and do not want to give them up. He finds happiness in their acquisition and feels unhappy at its loss. Then how to believe that happiness is not found in material things?

 

V:  Sister! What you find happiness in worldly objects is not real happiness but illusion of it. Happiness is in the minds of men. When a man makes use of things he feels comforted and comes to believe that happiness is obtained from them only. But frankly speaking, happiness is not obtained from a particular thing. He feels happy so because of

mind’s concentration. When a dog bites a dry bone, its gums starts bleeding and the dog [unaware of the fact that dry bone cannot have a blood] keeps on sucking the blood oozing from its own gums! Similarly where is the happiness in the worldly things outside? Happiness lies inside. This is known. If money were to spell happiness, then no rich man would have been unhappy. But the extent of worries that the rich man has is not there with the poor man. A rich man down with diseases could buy medicines but not health. That rich man   could employ teachers, workers, buy books but can he earn knowledge? No. He can earn knowledge and wisdom only thru hard intensified study. Likewise he may buy food but cannot buy hunger.

 

There are millionaires in the world who are unable to digest even one meal a day. Now tell me whether there is happiness inherent in money. If food were to bring happiness the quantum of happiness one derives by eating four chapattis should be four times by eating 16 chapattis. This is because happiness should be proportionate to the quantum of food eaten. But does this happen? By eating more than that satisfies his hunger he becomes sick requiring medication. Dry, tasteless food tastes like nectar when one is hungry, whereas, nectar tastes bitter when not hungry. Similar is the position about clothes. If clothes were to cause comfort, the same cloths that are comfortable  in winter should continue to be so in summer also and vice versa. If causing comfort were to be the nature of clothes then it should cause comfort in all seasons. Why warm clothes are not suited in summer and winter clothes are not suited for winter? The nature and character of a thing should remain constant under all circumstances. For ex, to burn a thing is the nature of Fire. This nature will not undergo change. Sweetness is the quality of sugar. Eat sugar at any time. You taste sweet only. Likewise, if causing happiness is the nature of worldly things, then people would not have sought happiness even after their possession. They should be feeling happy every second. Now be clear!  Will the problem of a person running high temperature could be overcome by putting him on a soft, silky bed? Never. Hence I tell you, that happiness does not lie in the worldly things. God is the source of Happiness and that is obtained by being nearer to Him.

 

K: If happiness were to be within, and real joy does not rest with the worldly things, then why a person derives happiness in eating sweets? Why he does not derive happiness by eating Mud? There is joy in eating Rotis but not sand. Sugar tastes but not grass. What is the reason for this?

 

V:  The feeling of happiness which we derive in eating sugar candy etc is because of the character of the latter and this does not constitute real happiness. The sweetness is felt when this is concentrated in mind. Then only he experiences joy in it. If sugar candy were to cause happiness then it should cause same happiness during fever also whereas sugar tastes bitter during fever. Similar is the case of chillies. Persons not habituated to taking chillies find it as poison. So is the case of other worldly things. Now about person not finding happiness in eating mud. If mind is concentrated in it then eating mud also becomes enjoyable. We might have seen some women eating mud balls. Some animals eat sand stones also. Leave this matter aside. We find people taking liquor which is awfully smelling, astringent and bitter. Opium is highly bitter but some people consume

it. People find happiness in these things. Does joy lie in these things? No. Man derives happiness in these things as long as his mind gets concentrated in them. A question may arise as to how the mind gets concentrated in an object. When a man becomes used to a thing he starts concentrating therein albeit temporarily is the answer. Because of habit, the inherent culture or the sanskars of that object leaves a strong impression on the mind. The sanskars of a particular thing instigates a person to use them often and often. Similar is the case of beautiful scenario. Man in order to see his mind gets relaxed goes to forests, Sea, Parks, mountains etc. But when he is entangled in a criminal case he does not derive joy in these places of interest. Strikingly good places appear to be drab, worthless places for him for the reason his mind is restless resulting in lack of concentration. A person goes to a music concert, Film show etc to enjoy. But if he finds his son being sick he does enjoy the show even though present. This is because the sickness of son has disturbed him. At times when our mind is busy roaming elsewhere, we are unaware of taste of food being eaten. Hence it is clear that happiness rests with when accompanied by concentrated mind and not in objects.

 

K: First you said that God is a prime source of all Happiness and now you are telling that happiness lie in concentrated mind. Why this dichotomy?

 

V: Only in the concentrated mind the blissful God is felt. The ignorant finds that happiness lie in the external things. This is not dichotomy. What is important to be known here is, because of habit man obtains   transient concentration in worldly things. Hence transient happiness is obtained. We may ultimately realize God if we start concentrating mind in comprehensive form in worship. This is the ultimate aim of life. Precisely for this reason, praise [Stuti] prayer [Prathana] and communion [Upaasana] is necessary, the object being let mind gets concentrated and thereby derive more and more happiness.

 

K: What is the proof that the more the mind is concentrated, the more happiness is derived?

 

V: I give a proof based on state of being while in wakeful {Jagrit] state and in deep slumber [Sushupthi] state. During wakeful position man’s transactions [vrithis] are spread over towards worldly things. Hence concentration is not attained. The mind rushes to one object or the other. But in sleep condition his mind’s activities are in concentrated, restful mode, and he feels happy after a good sleep. Getting up in the morning he says that he is happy because he got a good sleep overnight. The happiness he got in sleep was due to the mind’s concentration. The soul is relieved off the connection with worldly objects and rapprochement is done with God. The soul is attached either to worldly things or with God. The more he is attached to worldly things the more sorrow he experiences. The more he cultivates relationship with God he derives more happiness. This becomes clearer from the example. A person is in jail. He is ailing. He is pained at the loss of his wife and children. He is having lot of other worries.  He is disturbed but till when? These things drag him to restlessness as long he is in wakeful state.  Once he manages to get sleep all the troubles disappear and he enjoys the same amount of happiness that a king

enjoys. Even animals enjoy happiness in sleep. This is because that in Sleep his mind’s transactions are not scattered over, but remain concentrated. Control of mind’s transactions is called “YOGA” i.e. communion with God. When an intelligent communion is established with God thru Stuti, Prarthana, and Upaasana it is said that there is spiritual elevation. This spiritual upliftment reaches its zenith thru Samadhi where Soul becomes immersed with God. This is the ultimate aim of life.

 

K:  Which is called Stuthi, Prathana and Upaasana?

 

V:  Praising the God with full devotion and faith is called Stuthi. Seeking God’s help for the removal of his foibles or weaknesses from those Godly qualities is called Prarthana. Keeping away from the worldly things that involves his pride in self called Ahankar and strongly invoking a feeling that he is nearer to God is called Upaasana.

 

K: You believe that God has no Form. But large number of people in the world thinks otherwise and offer prayer to the Form. What is wrong in understanding that God has a Form or having a Body?

 

V: You will get answer to this question tomorrow.

 

ताज महल ही बाक्की रह गया था !

taajmahl and azam

आज आजमखान की मांग टीवी पर देखने को मिली ये नेता जी ताजमहल को वक्फ बोर्ड को देने की मांग कर रहे थे, जिसे एक इमाम ने समर्थन देते हुए यह भी कह दिया है की ताजमहल में ५ वक्त की नमाज भी होनी चाहिए, आजमखान कह रहे है की ताजमहल को वक्फ बोर्ड को सौंप दिया जाए क्योंकि यह एक मकबरा है और मकबरा होने के नाते इस पर वक्फ बोर्ड का हक़ बनता है, वक्फ बोर्ड को सौंपने से इससे होने वाली आमदनी से मुसलमानों की तालीम में उपयोग में लिया जा सके, और इसकी आमदनी से कम से कम दो यूनिवर्सिटी बन सकती है, बड़ा अचरज हुआ इनकी बेबुनियाद मांग को देख कर, क्या इन्हें सरकार द्वारा दी जा रही सब्सिडी कम लगती है, क्या देश की हजारों मस्जिदों से इतना धन भी प्राप्त नहीं होता की मुसलमानों की तालीम का अच्छे से बंदोबस्त किया जा सके, क्या इन मस्जिदों से प्राप्त धन का उपयोग कुरान में बताये जिहाद पर ज्यादा खर्च होता है ? इसलिए इन्हें अब ताजमहल का पैसा चाहिए |

तालीम की बात आई तो सोचा इनकी तालीम पर थोड़ी रौशनी डाल दी जाए तो आम जनता को कुछ जानकारी मिले और सेकुलरो की आँख की पट्टी खुल सके, इनकी तालीम की जानकारी मिलने के बाद हिन्दू-मुस्लिम भाई भाई शायद बोलना भी पाप लगने लगेगा, आइये आपको मदरसों की तालीम का दर्शन कराते है |

भारतीय मदरसों में भारत में स्कूलों में दी जाने वाली शिक्षा तो दी ही जाती है, यदि यही शिक्षा देनी है तो मदरसों की क्या जरुरत है, यह शिक्षा तो सरकारी स्कूलों में निःशुल्क दी जाती है, और उसमें ऐसा कोई कानून नहीं है की उसमें मुसलमान नहीं पढ़ सकते है हर कोई पढ़ सकता है तो अलग से मदरसा क्यों ?

मदरसों में स्कूली शिक्षा के अलावा एक शिक्षा और दी जाती है जिसे ये खुदाई पुस्तक कहते है, कुरान!! जी हाँ !! मदरसों में कुरानी की तालीम दी जाती है, इस तालीम को पाने के बाद कोई मुस्लिम हिन्दू- मुस्लिम भाई भाई का राग तो कतई नहीं अलापेगा !

ऐसा क्या है कुरान में जो मुसलमान इसकी तालीम पाने के बाद जिहादी बन जाता है, यह सोचने की जरुरत है इसी की जानकारी हम इस लेख में देना चाहते है

देखिये कुरान की तालीम

और जब इरादा करते हैं हम ये की हलाक अर्थात कत्ल करें किसी बस्ती को, और हुक्म करते है हम दौलतमंदों को उसके की, पास! नाफ़रमानी करते हैं, बीच उसके | बस! साबित हुई ऊपर उसके मात गिज़ाब की, बस! हलाक करते हैं हम उनको हलाक करना |
(कुरान मजीद, सुरा ६, रुकू २, आयत ६ )

और देखिये इससे अगली आयत में कहा गया है की-
और बहुत हलाक किये हैं हमने क्यों मबलगो? तुम्हारा खुदा तो जब उसे किसी बस्ती के हलाक करने का शौक चढ़ आये तब उसमें रहने वाले दौलतमंदों को नाफ़रमानी करने अर्थात आज्ञा न मानने वाले का हुक्म दे ! या यूँ कह सकते हैं की इसके इस हुक्म की तामिल करें नाफ़रमानी करो तो उन्हें और उनके साथ बस्ती में रहने वाले बेगुनाहों, मासूम बच्चों तक को अपना शौक पूरा करने के लिए हलाक अर्थात कत्ल करें !

और देखिये
और कत्ल कर दो, यहाँ तक की ना रहे फिसाद, यानी गलबा कफ्फार का ||
(कुरान मजीद, सुरा अन्फाल, आयत ३९)
मुशिरकों को जहाँ पाओ कत्ल कर दो और पकड़ लो और घेर लो और हर घात की जगह पर उनकी ताक में बैठे रहो …….||
(कुरान मजीद, सुरा तौबा, आयत ५)
इस आयत का नतीजा यदि देखना है तो देखो कश्मीरी पंडितों के साथ क्या हुआ था, केवल एक पत्र दिया गया की घर खाली करों एक दिन का समय है अन्यथा मार दिए जाओगे, और काफी संख्या में कश्मीरी पंडित मार दिए गए या भगा दिए गए,

और देखिये

ऐ नबी ! मुसलमानों को कत्लेआम अर्थात जिहाद क लिए उभारो ……||
(कुरान मजीद, सुरा अन्फाल, आयत ६५)

जब तुम काफिरों (गैर मुसलमान) से भीड़ जाओ तो उनकी गर्दन उड़ा दो, यहाँ तक की जब उनको खूब कत्ल कर चुको, और जो जिन्दा पकडे जाएँ, उनको मजबूती से कैद कर लो
(कुरान मजीद, सुरा मुहम्मद, आयत ४)

ऐ पैगम्बर! काफ़िरों और मुनाफिकों से लड़ो और उन पर सख्ती करो, उनका ठिकाना दोज़ख है, और वह बहुत ही बुरी जगह है |
(कुरान मजीद. सुरा तहरिम, आयत ९)

यह नजराना है कुरान से आपके लिए इसके अतिरिक्त भी बहुत कुछ भरा पड़ा है इस खुदाई पुस्तक में, अब कहिय जनाब ! यहाँ आपका क्या कहना है ? इन आयतों में क्या यहाँ धर्म के विरोधियों, जालिमों और बदमाशों के कत्ल करने इजाजत नहीं है | बल्कि स्पष्ट तौर पर काफ़िरों को कत्ल करने का निर्देश है, और आप ये जानते हैं की “काफिर” बद्चलनों, बदमाशों, चोरों, डाकुओं, लुटेरों और दुष्टों आदि को नहीं बल्कि उनको कहा जाता है जो की हजरत मोहम्मद साहब को खुदा का रसूल ना मानें, चाहे वो शख्स कितना भी नेक चलन, अच्छे आचरण वाला भला आदमी ही क्यों न हो ?
परन्तु चाहे जनता दुष्टाचरण करने वाली भी हो, दुनियाभर की बुराइयां उसमें मौजूद हों, परन्तु वह हजरत मोहम्मद साहब को खुदा का रसूल मान ले, बस! समझों की वह मोमिन बने बनाये हैं |

इतना कुछ जानने के बाद भी यदि आप मदरसों में दी जाने वाली तालीम के पक्षधर है, तो आपसे बड़ा धर्म का दुश्मन कौन हो सकता है, आजमखान साहब मदरसों की तालीम से इतना मोह कैसे है क्या मुज्जफरनगर दंगों से भी बड़ा काण्ड करने की इच्छा है क्या ??

अब ये सवाल तो स्वयं आजमखान चाह कर भी नहीं दे सकते है खैर मदरसों की चल चलन हम तो भलीं भांति जानते है बाकी पाठकगण समझदार है लेख पढ़े कुछ खामियां हो तो अवगत जरुर कराये

और हाँ !! अपना सेकुलरिज्म का चश्मा जरुर उतार लें !!

औ३म

नमस्ते

തന്ത്ര-മന്ത്രങ്ങള്‍ : സത്യവും മിഥ്യയും THANTHRIK KRIYAS – THE TRUTH AND MYTH

 

punapravachan

                                                                    ഉദ്യമേന ഹി സിദ്ധ്യന്തി കാര്യാണി ന മനോരഥൈ

പുരുഷാര്‍ത്ഥത്താല്‍ അഥവാ പരിശ്രമത്താല്‍ മാത്രമേ ഏതൊരുകാര്യവും നേടിയെടുക്കാനാവു. കേവലം മനോരഥത്താല്‍ (മനോരജ്യത്താല്‍) നടക്കില്ലെന്നര്‍ത്ഥം. ഇന്നത്തെ വൈജ്ഞാനിക യുഗത്തില്‍ ഒന്നിനും സമയമില്ലാതെ നെട്ടോട്ടമോടുന്നവര്‍ പെട്ടെന്നുള്ള കാര്യസാദ്ധ്യത്തിനായി കപട തന്ത്ര-മന്ത്രാദി പ്രചാരണങ്ങളുടെ പരസ്യത്തിനടിപ്പെട്ടു തങ്ങളുടെ വിലയേറിയ സമയവും,ധനവും നഷ്ടപ്പെടുത്തികൊണ്ടിരിക്കുന്നു.തകിട് ജപിച്ചു കെട്ടുക,താന്ത്രിക യന്ത്രങ്ങള്‍ തയ്യാറാക്കി വീടുകളില്‍ വക്കുക,ബാധകളെയും പ്രേതങ്ങളെയും ഒഴിപ്പിക്കാനായി ജ്യോതിഷികളുടെ കപട ഉപദേശ പ്രകാരം ചിലവേറിയ പൂജകളും മറ്റും നടത്തുക എന്നിവ ഇന്ന് സാര്‍വ്വത്രികമാണ്.ഹിന്ദുക്കള്‍ മാത്രമല്ല മറ്റു മതസ്ഥരും ഇക്കാര്യത്തില്‍ മുന്‍പന്തിയില്‍ ഉണ്ട്.സര്‍പ്പകോപത്തിനും ഗൃഹശാന്തി ക്കുമായി നടത്തുന്ന ഹോമങ്ങളും പൂജകളും വര്ദ്ധിച്ചുകൊണ്ടിരിക്കുന്നു. പ്രത്യേക രത്നങ്ങളും മുത്തുകളും ധരിച്ചാല്‍ രോഗനിവാരണവും ഐശ്വര്യവു മുണ്ടാകുമെന്നാണ് വെറൊരുകൂട്ടര്‍ പടച്ചു വിടുന്നത്. ഇതിനുപിന്നിലെ കച്ചവടതാത്പര്യത്തെ ആരും ശ്രദ്ധിക്കുന്നില്ല.കേരളത്തിലെ പ്രധാന ആഭരണശാലകളുടെ ഉടമകള്‍ ആരെല്ലമാണെന്നും അന്ധവിശ്വാസങ്ങള്‍ ക്കടിപ്പെട്ടു രത്നങ്ങളും കല്ലുകളും വാങ്ങികൂട്ടുന്നവര്‍ ഏതു മത വിഭാഗത്തില്‍ പെടുന്നവരാണെന്നും സ്വയം തിരിച്ചറിയുക. കോടികള്‍ മുടക്കി പൂരവും വെടിക്കെട്ടുകളും നടത്തുന്നവരും ഇതോര്‍ക്കുക. ഇത്തരം ആചാരങ്ങള്‍ ഒന്നും വൈദിക ധര്മ്മ്ത്തിന്റെ ഭാഗമല്ല എന്ന് പ്രത്യേകം ശ്രദ്ധിക്കുക.

മഹര്‍ഷി ദയാനന്ദന്‍ ഇത്തരം വേദ വിരുദ്ധമായ ക്രിയാപദ്ധതികളെ ശാസ്ത്രാര്ത്ഥംങ്ങളിലൂടെ തെറ്റാണെന്ന് ബോദ്ധ്യപ്പെടുത്തിയിട്ടുണ്ട്. വാഗ്ഭടാനന്ദ ഗുരുദേവന്‍ കേരളത്തില്‍ ഇത്തരം അനാചാരങ്ങള്‍ക്കെതിരെ ശക്തമായി പ്രതികരിച്ചിട്ടുമുണ്ട്. വേദവിഹിതമായ ആചാര പദ്ധതി കളിലേക്ക് മടങ്ങുകയാണ് ഈ ദുസ്ഥിതിക്കുള്ള പരിഹാരം. മഹര്‍ഷി മനു പ്രഖ്യാപിക്കുന്നു “വേദ പ്രതിപാദിതോ ധര്‍മ്മ: അധര്‍മ്മസ്ഥത് വിപര്യയ: ” വേദം പറയുന്നത് ധര്‍മ്മവും അതിനു വിപരീതമായത് അധര്‍മ്മവുമാമാണ് എന്നര്‍ത്ഥം.

മഹര്‍ഷി കണാദന്റെ അഭിപ്രായത്തില്‍ സാംസാരിക ഉല്‍ക്കര്‍ഷ ത്തിനും മോക്ഷ പ്രാപ്തിക്കുമുള്ള സാധനമാണ് ധര്‍മ്മം. അതായത് വേദോക്ത ധര്‍മ്മ പാലനത്തിലൂടെ നമുക്ക് ലൌകിക സമൃദ്ധിയും മോക്ഷ പ്രാപ്തിയും നേടാനാവുമെന്ന്. ഇതിനു വിരുദ്ധമായാചരണത്തിലൂടെ സര്‍വസ്വവും നഷ്ടപ്പെടുന്നു. നമ്മുടെ ചരിത്രം ഇതിനു സാക്ഷിയാണ്. വേദോക്ത ധര്‍മ്മം ചിട്ടയോടെ പാലിക്കപ്പെട്ടിരുന്ന കാലത്ത് ആര്യാവര്‍ത്തം (ഇന്നത്തെ ഭാരതം) വിശ്വഗുരുവായി വാഴ്ത്ത പ്പെട്ടിരുന്നു. ഭാരതത്തെ വീണ്ടും ആ ഉന്നത പദവിയിലേക്കുയര്‍ത്താന്‍ മഹര്‍ഷി ദയാനന്ദന്‍റെ “വേദങ്ങളിലേക്ക് മടങ്ങുക ” എന്ന ആഹ്വാനത്തെ ശിരസ്സാ വഹിച്ച് മുന്നേറാം.